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Verse 1श्रीमत्पयोनिधिनिकेतन चक्रपाणे
भोगीन्द्रभोगमणिराजित पुण्यमूर्ते ।
योगीश शाश्वत शरण्य भवाब्धिपोत
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ 1 ॥
Simple Hindi meaningहे क्षीरसागर के निवासी, चक्रधारी प्रभु! शेषनाग की मणियों से आपकी पवित्र मूर्ति सुशोभित है। आप योगियों के स्वामी, शाश्वत आश्रय और संसार-सागर पार कराने वाली नौका हैं। मेरा हाथ थामिए।परिस्थितियाँ बदलती हैं; प्रार्थना हमें अपने स्थायी आध्यात्मिक आधार की याद दिलाती है।
Verse 2ब्रह्मेन्द्ररुद्रमरुदर्ककिरीटकोटि-
सङ्घट्टिताङ्घ्रिकमलामलकान्तिकान्त ।
लक्ष्मीलसत्कुचसरोरुहराजहंस
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ 2 ॥
Simple Hindi meaningब्रह्मा, इन्द्र, रुद्र, मरुद्गण और सूर्य के मुकुट आपके निर्मल चरणकमलों को स्पर्श करते हैं। लक्ष्मीजी के कमल-सदृश वक्ष पर आप राजहंस के समान सुशोभित हैं। मुझे सहारा दीजिए।प्रभु के स्वरूप में दिव्य महिमा के साथ प्रेम और कोमलता भी हैं।
Verse 3संसारदावदहनाकरभीकरोरु-
ज्वालावलीभिरतिदग्धतनूरुहस्य ।
त्वत्पादपद्मसरसीरुहमागतस्य
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ 3 ॥
Simple Hindi meaningसंसार की भीषण दावाग्नि ने मुझे झुलसा दिया है। मैं आपके चरणकमलों के शीतल आश्रय में आया हूँ। हे लक्ष्मीनृसिंह, मुझे सहारा दीजिए।क्रोध, चिंता और निरन्तर संघर्ष की तपन में भगवान का स्मरण मन को ठहरने का स्थान देता है।
Verse 4संसारजालपतितस्य जगन्निवास
सर्वेन्द्रियार्थबडिशाग्रझषोपमस्य ।
प्रोत्कम्पितप्रचुरतालुकमस्तकस्य
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ 4 ॥
Simple Hindi meaningहे जगत् के आश्रय! मैं संसार के जाल में फँसी उस मछली जैसा हूँ जो इन्द्रिय-विषयों के काँटे में अटककर छटपटा रही है। मेरी व्याकुलता पर कृपा करके मुझे सहारा दीजिए।हर आकर्षण हितकारी नहीं होता। विवेक से पहचानें कि कौन-सी चाह हमें बाँध रही है।
Verse 5संसारकूपमतिघोरमगाधमूलं
सम्प्राप्य दुःखशतसर्पसमाकुलस्य ।
दीनस्य देव कृपया पदमागतस्य
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ 5 ॥
Simple Hindi meaningमैं संसार के गहरे, भयावह कुएँ में गिरा हूँ जहाँ अनेक दुःख सर्पों की तरह घिरे हैं। असहाय होकर आपके चरणों में आया हूँ। हे प्रभु, मेरा हाथ थामिए।अपनी असहायता स्वीकार करना सहायता की ओर बढ़ने का पहला कदम हो सकता है।
Verse 6संसारभीकरकरीन्द्रकराभिघात-
निष्पीड्यमानवपुषः सकलार्तिनाश ।
प्राणप्रयाणभवभीतिसमाकुलस्य
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ 6 ॥
Simple Hindi meaningहे समस्त पीड़ा दूर करने वाले! संसाररूपी भयानक हाथी के प्रहारों से मैं दबा जा रहा हूँ। मृत्यु और सांसारिक अस्तित्व का भय मुझे व्याकुल करता है। मुझे सहारा दीजिए।जिन परिस्थितियों को नियंत्रित नहीं कर सकते, उनमें धैर्य और आन्तरिक आश्रय माँगें।
Verse 7संसारसर्पविषदिग्धमहोग्रतीव्र-
दंष्ट्राग्रकोटिपरिदष्टविनष्टमूर्तेः ।
नागारिवाहन सुधाब्धिनिवास शौरे
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ 7 ॥
Simple Hindi meaningसंसाररूपी सर्प के विषैले, तीखे दाँतों से घायल होकर मैं नष्टप्राय हूँ। हे गरुड़वाहन, अमृत-सागर के निवासी, पराक्रमी प्रभु! मुझे सहारा दीजिए।कटुता और हानिकारक आसक्तियों को पहचानकर उनसे निकलने की शक्ति माँगें।
Verse 8संसारवृक्षमघबीजमनन्तकर्म-
शाखायुतं करणपत्रमनङ्गपुष्पम् ।
आरुह्य दुःखफलितं पततो दयालो
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ 8 ॥
Simple Hindi meaningसंसाररूपी वृक्ष का बीज पाप है, शाखाएँ अनन्त कर्म हैं, इन्द्रियाँ पत्ते हैं और कामना फूल है। दुःख के फल देने वाले इस वृक्ष से मैं गिर रहा हूँ। हे दयालु प्रभु, मुझे थाम लीजिए।कर्म और इच्छाओं की जड़ों को समझे बिना केवल परिणाम बदलना कठिन है।
Verse 9संसारसागरविशालकरालकाल-
नक्रग्रहग्रसितनिग्रहविग्रहस्य ।
व्यग्रस्य रागनिचयोर्मिनिपीडितस्य
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ 9 ॥
Simple Hindi meaningसंसार के विशाल समुद्र में कालरूपी भयंकर मगर ने मुझे पकड़ लिया है। आसक्ति की लहरें मुझे पीड़ित कर रही हैं। हे लक्ष्मीनृसिंह, मुझे सहारा दीजिए।समय सीमित है; हर इच्छा के पीछे भागने के बजाय जीवन की दिशा चुनें।
Verse 10संसारसागरनिमज्जनमुह्यमानं
दीनं विलोकय विभो करुणानिधे माम् ।
प्रह्लादखेदपरिहारपरावतार
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ 10 ॥
Simple Hindi meaningहे सर्वव्यापी करुणानिधान! संसार-सागर में डूबते और भ्रमित होते मुझ असहाय को देखिए। प्रह्लाद का दुःख दूर करने के लिए अवतार लेने वाले प्रभु, मेरा भी हाथ थामिए।प्रह्लाद का स्मरण विश्वास जगाता है कि कठिनाई में भी भक्ति का आधार बना रह सकता है।
Verse 11संसारघोरगहने चरतो मुरारे
मारोग्रभीकरमृगप्रचुरार्दितस्य ।
आर्तस्य मत्सरनिदाघसुदुःखितस्य
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ 11 ॥
Simple Hindi meaningहे मुरारे! संसार के भयावह वन में भटकते हुए मैं कामनारूपी हिंसक पशुओं से पीड़ित हूँ। ईर्ष्या की गर्मी ने भी मुझे संतप्त किया है। मुझे सहारा दीजिए।तुलना और ईर्ष्या शान्ति छीनती हैं। अपने कर्तव्य और साधना पर लौटें।
Verse 12बद्ध्वा गले यमभटा बहु तर्जयन्तः
कर्षन्ति यत्र भवपाशशतैर्युतं माम् ।
एकाकिनं परवशं चकितं दयालो
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ 12 ॥
Simple Hindi meaningजब यम के दूत मुझे बाँधकर डराते हुए खींचें और मैं सांसारिक बन्धनों में जकड़ा, अकेला, विवश तथा भयभीत होऊँ, तब हे दयालु लक्ष्मीनृसिंह, मुझे सहारा दीजिए।अन्तिम असुरक्षा के सामने भी यही प्रार्थना है—आपकी स्मृति और आश्रय मेरा साथ न छोड़ें।
Verse 13लक्ष्मीपते कमलनाभ सुरेश विष्णो
यज्ञेश यज्ञ मधुसूदन विश्वरूप ।
ब्रह्मण्य केशव जनार्दन वासुदेव
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ 13 ॥
Simple Hindi meaningहे लक्ष्मीपति, कमलनाभ, देवताओं के स्वामी विष्णु! हे यज्ञ के स्वामी, यज्ञस्वरूप, मधुसूदन और विश्वरूप! हे ब्रह्मण्य, केशव, जनार्दन, वासुदेव—मुझे सहारा दीजिए।अनेक नामों में एक ही आराध्य को पुकारकर मन उसी आश्रय पर लौटता है।
Verse 14एकेन चक्रमपरेण करेण शङ्ख-
मन्येन सिन्धुतनयामवलम्ब्य तिष्ठन् ।
वामेतरेण वरदाभयपद्मचिह्नं
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ 14 ॥
Simple Hindi meaningआप एक हाथ में चक्र और दूसरे में शंख धारण करते हैं; एक से समुद्र-कन्या लक्ष्मीजी को सहारा देते हैं और एक से वर तथा अभय प्रदान करते हैं। मुझे भी सहारा दीजिए।प्रभु का स्वरूप शक्ति, स्नेह, उदारता और निर्भयता को एक साथ प्रकट करता है।
Verse 15अन्धस्य मे हृतविवेकमहाधनस्य
चोरैर्महाबलिभिरिन्द्रियनामधेयैः ।
मोहान्धकारकुहरे विनिपातितस्य
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ 15 ॥
Simple Hindi meaningइन्द्रिय नामक शक्तिशाली चोरों ने मेरा विवेकरूपी महान धन छीन लिया है। मैं अन्धा-सा होकर मोह की अँधेरी गुफा में गिर पड़ा हूँ। हे लक्ष्मीनृसिंह, मेरा हाथ थामिए।प्रार्थना केवल संकट से छुटकारे की नहीं, सही और गलत पहचानने की क्षमता लौटाने की भी है।
Verse 16प्रह्लादनारदपराशरपुण्डरीक-
व्यासादिभागवतपुङ्गवहृन्निवास ।
भक्तानुरक्तपरिपालनपारिजात
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥ 16 ॥
Simple Hindi meaningआप प्रह्लाद, नारद, पराशर, पुण्डरीक और व्यास जैसे श्रेष्ठ भक्तों के हृदय में निवास करते हैं। भक्तों के प्रति प्रेम और उनके संरक्षण में आप पारिजात वृक्ष के समान हैं। मुझे सहारा दीजिए।भक्ति संकट में पुकारने के साथ हृदय में करुणा, स्मरण और सदाचार का स्थान बनाना भी है।
Verse 17लक्ष्मीनृसिंहचरणाब्जमधुव्रतेन
स्तोत्रं कृतं शुभकरं भुवि शङ्करेण ।
ये तत्पठन्ति मनुजा हरिभक्तियुक्ता-
स्ते यान्ति तत्पदसरोजमखण्डरूपम् ॥ 17 ॥
Simple Hindi meaningलक्ष्मीनृसिंह के चरणकमलों के मधु में अनुरक्त भ्रमर-समान शंकर ने इस मंगलकारी स्तोत्र की रचना की। फलश्रुति कहती है कि इसे हरि-भक्ति से पढ़ने वाले उनके अखण्ड चरणकमलरूपी परम आश्रय को प्राप्त होते हैं।यह भक्ति का आध्यात्मिक वचन है। पाठ का केन्द्र भगवान से सम्बन्ध और समर्पण है; इसे भौतिक लाभ का निश्चित सौदा न मानें।